नव-रोज़ हो, या नव वर्ष हो
हम अपनी अपनी
हर एक हत्या की हुई निर्भया पुत्री
के लिए केवल शोक मनायेंगे
और तब तक शोक मनाते रहेंगे
जब तक
किसी भी देश की पुत्री का
चीर रहण होना समाप्त न हो…
तो आज भारत और पाकिस्तान की हालत
यह न होती
जो है…
पृथवी राज चौहान
और जयचन्द के ज़माने में
उत्सव मनाना बंद किया गया होता
तो हिन्दोस्तान का इतिहास
कुछ और ही होता…
हमें दासत्व में
पडना न पडता…
हम दासजन दास ही रहे
कभी टस से मस न हुए…
जशन मनाते रहे
अपनी अपनी समाजी बदहाली का
जहाँ जहाँ हमें रोना चाहिए था
वहाँ वहाँ हम
पागलों की तरह हंसते गाते रहे
निरर्थक रचनायें…
आज साथियो
नव वर्ष के अवसर पर
मैं रो रहा हूँ
मैं मातम कर रहा हूँ
उन बच्चों के लिए जिन की आँखें
इस साल उन से छीनी गयीं
उन लोगों के लिए, जो इस साल गायल हुए
उन विवश सामान्य जन के लिए
जिन के घरबार इस वर्ष नष्ट किए गए
उन यज़ीदी जनों की पुत्रियों के लिए
जो इस वर्ष दुर्योधनों के सब से पागल प्रकार के हाथों
लाचारी, असभ्यता,… की चरम अवस्था में पहुँचायीं गयीं
आज के युग के सभी वर्षों पर
मैं मातम कर रहा हूँ
तुम जशन मनाव
….
ज़िहन निशीन