इस रस्म के अवसर पर

गूँज रहा है कोई शंखनाद

मस्तिष्क में

जो शीघ्र ही लावे की भाँति

ज्वालामुखी से निकल सकता है

और मस्तिष्क के कोलाहल में

कुछ राहत ला सकता है…

उफ यह पशुता

उफ यह हत्या हिंसा के विश्व परिवेश में

रस्मों से दिल बहलाने की आदत

उफ यह तुच्छता के साथ समझौते करने की आदत

….

उफ यह हालात से टस से मस न होने की असभ्यता…

किस किस पर अफसोस करूँ…

मैं जानता हूँ

जब कश्मीर तथा कश्मीर के सारे लोगों को

कुछ अंग्रेज़ सौदागर

हैवानों की मानंद

गुलाब सिंह को बेच रहे थे

कश्मीरी अवाम ईद मना रहे थे

दुर्गा पूजा कर रहे थे

काश, काश एक बार

चार पाँच साल के लिए

रज़ामंदी या स्वैच्छा से

ईद न मनायी गयी होती

शिव रात्री न मनाई गयी होती

और हुकमरानों से कहा गया होता

हमें तुम्हारी गुण्डागर्दी, जंगो जदल

भ्रष्टाचार

मानव संहार

मानव पतन

आदि से घृणा है

और तुम्हारी नीतियों के विरोध में

हम ईद मनाना बंद कर रहे हैं

शिवरात्रि मनाना समाप्त कर रहे हैं

लो, अब हम केवल मातम मनाते हैं

कोई जशन नहीं मनायेंगे

किसी को बधाई नहीं देंगे

किसी का अपमान नहीं करेंगे…

नव-रोज़ हो, या नव वर्ष हो

हम अपनी अपनी

हर एक हत्या की हुई निर्भया पुत्री

के लिए केवल शोक मनायेंगे

और तब तक शोक मनाते रहेंगे

जब तक

किसी भी देश की पुत्री का

चीर रहण होना समाप्त न हो…

तो आज भारत और पाकिस्तान की हालत

यह न होती

जो है…

पृथवी राज चौहान

और जयचन्द के ज़माने में

उत्सव मनाना बंद किया गया होता

तो हिन्दोस्तान का इतिहास

कुछ और ही होता…

हमें दासत्व में

पडना न पडता…

हम दासजन दास ही रहे

कभी टस से मस न हुए…

जशन मनाते रहे

अपनी अपनी समाजी बदहाली का

जहाँ जहाँ हमें रोना चाहिए था

वहाँ वहाँ हम

पागलों की तरह हंसते गाते रहे

निरर्थक रचनायें…

आज साथियो

नव वर्ष के अवसर पर

मैं रो रहा हूँ

मैं मातम कर रहा हूँ

उन बच्चों के लिए जिन की आँखें

इस साल उन से छीनी गयीं

उन लोगों के लिए, जो इस साल गायल हुए

उन विवश सामान्य जन के लिए

जिन के घरबार इस वर्ष नष्ट किए गए

उन यज़ीदी जनों की पुत्रियों के लिए

जो इस वर्ष दुर्योधनों के सब से पागल प्रकार के हाथों

लाचारी, असभ्यता,… की चरम अवस्था में पहुँचायीं गयीं

आज के युग के सभी वर्षों पर

मैं मातम कर रहा हूँ

तुम जशन मनाव

….

ज़िहन निशीन